MITS संस्थान प्रबंधन ने कॉलेज कैंपस में बिना अधिकार लगाया छात्रों के अधिकारों पर प्रतिबंध, छात्रों ने कहा दमनकारी नीति नहीं चलेगी अक्सर इसी तरह नियमों और शासन के आदेशों को तोड़मरोड़कर थोपा जाता है…

MITS संस्थान प्रबंधन ने कॉलेज कैंपस में बिना अधिकार लगाया छात्रों के अधिकारों पर प्रतिबंध, छात्रों ने कहा दमनकारी नीति नहीं चलेगी अक्सर इसी तरह नियमों और शासन के आदेशों को तोड़मरोड़कर थोपा जाता है…
एमआईटीएस संस्थान के कथित कुलगुरु आरके पण्डित पर आर्थिक अनियमितताओं और प्रशासनिक अनियमितताओं के आरोप लगने के बाद जांच एजेंसियां जांच कर रही है वहीं छात्र भी कथित कुलगुरु की अंधेरगर्दी के विरुद्ध मैदान में उतर आए है और तथ्य तथा प्रमाण आधारित आरोपों पर उनसे जवाब भी मांग रहे है।

प्राप्त जानकारी अनुसार छात्रों को हिसाब देने से बचने के प्रयास के चलते कथित कुलगुरु ने अपने अधीनस्थ डीन स्टूडेंट एडमिनिस्ट्रेशन डॉक्टर आरएस जादौन के हस्ताक्षर से संस्थान परिसर में छात्रों के कॉलेज में छात्रों की आवाज को दबाने के लिए छात्रों को बेवकूफ बनाने के उद्देश्य से एक आदेश जारी कर जिला प्रशासन द्वारा दंगे रोकने वाली धारा bnss 163 का उल्लेख कर संस्थान में धारा bnss 163 के तहत छात्रों द्वारा एकत्रता, रैली, प्रदर्शन, धरना आदि पर रोक लगाने की बात कहते हुए भारतीय न्याय संहिता की धारा 163 का डर दिखाया है जबकि मप्र हाईकोर्ट के वरिष्ठ अभिभाषक अवधेश सिंह तोमर के अनुसार इस धारा का प्रयोग करने का अधिकार दंगे फसाद रोकने और शांति व्यवस्था बनाकर रखने के लिए सिर्फ और सिर्फ जिला मजिस्ट्रेट एवं एसडीएम द्वारा ही किया जा सकता है। भारतवर्ष में किसी भी शैक्षणिक संस्थान छात्रों अथवा छात्र संगठन को अपनी मांगे रखने एकत्रता, रैली, प्रदर्शन, धरना इत्यादि से रोकने का अधिकार नहीं रखता है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने तो प्रत्येक संस्थान में छात्र संघ के चुनाव कराने संबंधित आदेश भी पूर्व में जारी किए हुए हैं।

एमआईटीएस छात्रों ने इस तालिबानी दमनकारी आदेश को गलत बताया है और इसे कथित कुलगुरु की प्रशासनिक अनियमितताओं का नया उदाहरण बताया है और यह भी कहा है कि इस प्रकार के एक नहीं कई शासन के नियमों और आदेश को तोड़ मरोड़कर इनके द्वारा जारी कर थोपे जाते है।
जल्द ही अब प्रदर्शन और तेज किए जाएंगे चाहे उसके लिए चेयरमैन सिंधिया एवं एक्जीक्यूटिव बोर्ड मेंबर के समक्ष भी अपनी मांग रखनी पड़े तो भी पीछे नहीं हटेंगे, इन्हें अब कुर्सी छोड़नी ही होगी।
हालांकि मंगलवार 4 अगस्त की रात संस्थान की छात्रा द्वारा आत्महत्या करने के बाद 5 अगस्त को छात्रों द्वारा किए गए प्रदर्शन के बाद छात्रों की लेट फीस में वृद्धि के आदेश को वापस ले लिया गया है जिसको लेकर छात्रों में उत्साह भी है लेकिन खबर लिखे जाने तक संस्थान प्रबंधन द्वारा छात्रों को भ्रमित करने वाले आदेश क्रमांक 717 को निरस्त नहीं किया गया है जिसके चलते छात्रों में रोष बढ़ता जा रहा है। छात्रों ने मीडिया से बात करते हुए यह भी कहा कि चूंकि मृतका छात्रा पिछले कुछ समय से मानसिक दबाव में थी और वह साथी छात्र छात्राओं से अपनी परेशानी जाहिर कर चुकी थी फिर क्या वजह रही कि स्टूडेंट काउंसलर होते हुए भी छात्रा की काउंसलिंग नहीं की गई यदि की जाती तो शायद बिना पिता के साए में रह रही एक माँ की बेटी की जान बचाई जा सकती थी। यह प्रबंधन की लापरवाही नहीं तो आखिर क्या है वहीं इसके विपरीत छात्रों पर प्रतिबंध लगाया जाना क्या उचित है ?
स्पष्ट है कि कथित कुलगुरु अपने चहेतो को बचाने दमनकारी नीति अपना रहे है जो असंवैधानिक है।



