भितरवार में लोकमाता देवी अहिल्या बाई होलकर की 301वीं जयंती पर भव्य चल समारोह, जगह-जगह हुआ स्वागत; उमड़ा पाल-बघेल समाज

ग्वालियर जिले के भितरवार नगर में पाल-बघेल समाज द्वारा न्याय, त्याग और धर्म परायणता की प्रतिमूर्ति लोकमाता देवी अहिल्या बाई होलकर जी की 301वीं जयंती अत्यंत हर्षोल्लास, भव्यता और धूमधाम के साथ मनाई गई। इस पावन अवसर पर नगर में एक विशाल एवं आकर्षक चल समारोह (गौरव यात्रा) निकाला गया। अहिल्याबाई के जयकारों से पूरा भितरवार नगर गूंजायमान हो उठा। चल समारोह के दौरान समूचे नगर में सामाजिक एकता और उत्सव का एक अनूठा माहौल देखने को मिला।
गायत्री मंदिर से शुरू होकर कृष्णा लॉज पर संपन्न हुई भव्य यात्रा
जयंती महोत्सव के तहत आयोजित इस भव्य चल समारोह की शुरुआत घाटमपुर के समीप स्थित प्रसिद्ध गायत्री मंदिर से हुई। पाल-बघेल समाज के युवाओं और वरिष्ठ जनों की अगुवाई में यह यात्रा नगर के विभिन्न मुख्य मार्गों और चौराहों से होते हुए गुजरी, जिसका समापन कृष्णा लॉज पर जाकर हुआ।
चल समारोह का स्वागत करने के लिए पूरे नगर में अभूतपूर्व उत्साह देखा गया। जगह-जगह पर स्थानीय नागरिकों और विभिन्न संगठनों द्वारा देवी अहिल्या बाई के चित्र पर भव्य आरती उतारी गई और फूल मालाएं पहनाकर स्वागत किया गया। पूरी यात्रा मार्ग पर पुष्पवर्षा की गई। भीषण गर्मी को देखते हुए नगरवासियों द्वारा जगह-जगह मीठा शरबत, दही की लस्सी और नींबू शिकंजी पिलाकर यात्रियों का स्वागत किया गया। इसी क्रम में श्री रघुवीर वकील द्वारा देवी अहिल्या बाई को पुष्प अर्पित कर श्रद्धालुओं को फल वितरित किए गए।
युवाओं को लक्ष्य तय कर आगे बढ़ने की जरूरत: बलराम बघेल
चल समारोह के समापन पर आयोजित सभा को संबोधित करते हुए बघेल समाज के युवा नेता और सोशल मीडिया कांग्रेस के भितरवार ब्लॉक अध्यक्ष बलराम बघेल ने देवी अहिल्या बाई के जीवन और उनके महान योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने अपने संबोधन की शुरुआत एक सुंदर काव्य पंक्ति से की:
“सत्रहवीं शताब्दी पच्चीस में था चमका एक सितारा,
धन्य हो गया होलकर वंश, धन्य हुआ बघेल समाज हमारा।”
बलराम बघेल ने कहा कि भारत में जिन महिलाओं को आदर्श, त्याग, वीरता और देश भक्ति के लिए सदा याद किया जाता है, उनमें लोकमाता अहिल्या बाई होलकर का नाम सर्वोपरि है। 31 मई 1725 को जन्मीं अहिल्या बाई ने पति और ससुर के देहावसान के बाद जिस तरह राजपाट संभाला, वह अनुकरणीय है। उन्होंने प्रजा को अपनी संतान माना और काशी विश्वनाथ मंदिर (1785) सहित देश भर में सैकड़ों मंदिरों, कुओं, बावलियों और धर्मशालाओं का निर्माण कराया। न्याय की खातिर अपने पुत्र को भी दंड देने के कारण ही उन्हें ‘लोकमाता’ के साथ-साथ ‘देवी’ की उपाधि मिली।
उन्होंने उपस्थित युवाओं में जोश भरते हुए कहा कि युवा देश का वर्तमान और भविष्य हैं। युवाओं को स्वामी विवेकानंद के संदेशों को आत्मसात करते हुए जीवन में एक बड़ा लक्ष्य तय करना चाहिए और उसे हासिल करने के लिए निरंतर प्रयास करना चाहिए।



