ग्वालियर: नामी संस्थान MITS में नियुक्तियों और फंड के दुरुपयोग के गंभीर आरोप, केंद्रीय मंत्री सिंधिया के संरक्षण पर भी उठे सवाल

विशेष संवाददाता, ग्वालियर
मध्य प्रदेश के प्रतिष्ठित और विश्वविख्यात इंजीनियरिंग संस्थान माधव इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस (MITS), ग्वालियर में प्रशासनिक पारदर्शिता, नियुक्तियों और वित्तीय अनियमितताओं को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। ग्वालियर के जाने-माने एडवोकेट अवधेश तोमर ने संस्थान में प्रोफेसर्स की भर्ती प्रक्रिया, बुनियादी ढांचे की कमी और प्रबंधन के शीर्ष स्तर पर कथित भ्रष्टाचार को लेकर बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं, जिससे शैक्षणिक और प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है।
फैकल्टी नियुक्तियों में पारदर्शिता का अभाव और इंफ्रास्ट्रक्चर पर सवाल
एडवोकेट अवधेश तोमर का सीधा आरोप है कि MITS में लंबे समय से फैकल्टी की नियुक्तियों में नियमों को ताक पर रखा जा रहा है। कई योग्य आवेदकों को आवेदन के बाद प्रक्रिया से जुड़ी कोई स्पष्ट सूचना नहीं दी गई, न ही चयन प्रक्रिया की पर्याप्त सार्वजनिक जानकारी साझा की गई।
इसके साथ ही उन्होंने संस्थान की शैक्षणिक गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए कहा कि यहाँ लगातार नए-नए कोर्स तो शुरू किए जा रहे हैं, लेकिन उनके अनुरूप रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर, इंडस्ट्री सहयोग और प्लेसमेंट की कोई ठोस व्यवस्था मजबूत नहीं की गई है। विशेष रूप से कंप्यूटर साइंस, एमबीए (MBA) और कुछ नए रिसर्च प्रोग्राम्स को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
शिकायतकर्ता का बयान: “यदि किसी संस्थान को स्वायत्तता (Autonomy) दी गई है, तो उसका उद्देश्य शिक्षा और शोध की गुणवत्ता बढ़ाना होना चाहिए, न कि केवल कोर्स और सीटों की संख्या बढ़ाकर व्यापार करना।” एडवोकेट तोमर ने राज्य सरकार और उच्च शिक्षा विभाग से मांग की है कि संस्थान की कार्यप्रणाली और नियुक्तियों की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
सवालों पर भड़के वाइस चांसलर, पत्रकारों से किया गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार
इन गंभीर आरोपों पर जब मीडिया कर्मी संस्थान का पक्ष जानने और वाइस चांसलर (VC) आर.के. पण्डित से प्रतिक्रिया लेने पहुंचे, तो प्रबंधन का बेहद अड़ियल और गैर-जिम्मेदाराना रवैया सामने आया। चेंबर के बाहर से ही दो टूक शब्दों में कहा गया कि वे वकील के माध्यम से नोटिस भेजेंगे। चौंकाने वाली बात यह है कि शिकायतकर्ता के पास अब तक संस्थान की तरफ से ऐसा कोई कानूनी नोटिस नहीं पहुंचा है। मीडिया के सवालों से इस तरह दूरी बनाना यह साफ संकेत देता है कि कहीं न कहीं शिकायतकर्ता के पास मौजूद प्रमाणों से प्रबंधन में घबराहट है।
केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के ‘संरक्षण’ और चेयरमैन की भूमिका पर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब सबसे बड़ा सवाल संस्थान के शीर्ष नेतृत्व पर उठ रहा है। क्षेत्र के जनसेवक और केंद्रीय मंत्री श्रीमंत ज्योतिरादित्य सिंधिया इस प्रतिष्ठित डीम्ड विश्वविद्यालय के चेयरमैन हैं। ऐसे में स्थानीय स्तर पर यह चर्चा तेज है कि आखिर क्यों इस विश्वविख्यात संस्थान की साख को मटियामेट करने पर आतुर प्रबंधन को शीर्ष स्तर से संरक्षण मिल रहा है? स्वयंभू बने बैठे कुलगुरु (VC) की हरकतों पर चेयरमैन की ओर से अब तक कोई दंडात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
लेखा शाखा का बड़ा खुलासा: MITS के पैसे से सचिव महोदय के ऐशो-आराम और आलीशान मकान का रिनोवेशन!
संस्थान के भीतर मचे इस घमासान के बीच MITS की लेखा शाखा (Accounts Section) के सूत्रों से बेहद सनसनीखेज जानकारियां छनकर बाहर आ रही हैं। सूत्रों के मुताबिक, संस्थान के सचिव रमेश अग्रवाल को उपकृत करने के लिए संस्थान के फंड का जमकर दुरुपयोग किया जा रहा है:
-
घरेलू स्टाफ का खर्च संस्थान पर: सचिव महोदय के निजी आवास पर तैनात सिक्योरिटी गार्ड से लेकर घर में काम करने वाले नौकरों तक का वेतन MITS के खाते से जा रहा है।
- सूत्रों की माने तो
-
निजी कार और ईंधन का भुगतान: सचिव जिस लग्जरी कार से चलते हैं, उस गाड़ी की कीमत, ड्राइवर की सैलरी और पेट्रोल-डीजल का पूरा खर्च भी MITS प्रशासन उठा रहा है।
-
पुश्तैनी मकान का कायाकल्प: सबसे बड़ा आरोप यह है कि पाटनकर बाजार (राम मंदिर चौराहा के पास) तंग गली में स्थित पूर्व विधायक महोदय के पुश्तैनी मकान का जो आलीशान रिनोवेशन (नवीनीकरण) हुआ है, उसका पूरा भुगतान भी कुलगुरु ने संस्थान के पैसों से ही कराया है।
यही वजह है कि संस्थान की साख दांव पर होने के बावजूद सचिव रमेश अग्रवाल इस पूरे मामले में खुलकर वाइस चांसलर के बचाव में खड़े नजर आ रहे हैं। अब देखना यह होगा कि इस बड़े खुलासे के बाद उच्च शिक्षा विभाग और चेयरमैन ज्योतिरादित्य सिंधिया इस भ्रष्टाचार के खिलाफ क्या कदम उठाते हैं।




