MITS प्रकरण : डायरेक्टर पद पर चयन से पूर्व देशभर की दर्जनो संस्थाओं ने Reject किया, खुद MITS और SATI प्रबंधन बोर्ड ने भी दो बार Reject किया उसे कैसे बनाया डायरेक्टर और कुलगुरु….
MITS देश का अग्रणी और प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान, लेकिन क्या आप सोच सकते है एक व्यक्ति जो बेहद दोयम दर्जे की शैक्षणिक योग्यता रखता हो उसकी अति महत्वाकांक्षा का जीवंत उदाहरण इस संस्थान के साहब स्वयं है जो चारों तरफ जांच एजेंसियां की जांच के घेरे में आने के बाद शहर के महंगे होटलों-क्लबों में मदहोशी के आवेश में वरिष्ठसाथियों से कभी कहते है मुझे बचाओ और कभी प्रशासनिक बैठक के समापन पर अहंकार से कहते है वकील तो यूं ही है कुछ बदलने नहीं वाला, महाराज भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। उनकी भी सम्पत्तियों का हिसाब किताब मै ही रख रहा हूँ।

प्राप्त जानकारी अनुसार साल 2015 महीना मार्च का, साहब को एन केन प्रकरेन डायरेक्टर का प्रभार सौंपा गया इसके बाद साल 2016 में जैसे मानिए महज नाम के ओपन सिलेक्शन से एम केन प्रकरेन साहब को आखिरकार डायरेक्टर बना दिया गया।

जिसकी साहब को सालों से दरकार थी लेकिन शैक्षणिक अयोग्यता आड़े आती रही लेकिन अंततः अबकी बार साहब को सफलता मिल ही गई।

अन्य टीवी न्यूज चैनलों और अधिवक्ता तोमर द्वारा मीडिया के समक्ष प्रस्तुत दस्तावेज अनुसार कुलगुरू साहब की यही अवैध नियुक्ति अब पूरी की पूरी चयन समिति पर बड़ा प्रश्नचिन्ह बनकर मीडिया के सामने आई है क्योंकि प्राप्त जानकारी अनुसार इस संस्थान का डायरेक्टर बनने से पूर्व साहब ने देशभर की लगभग दर्जनभर शैक्षणिक संस्थाओं में डायरेक्टर व उसके समान पदों के लिए आवेदन किए परंतु शैक्षणिक अयोग्यता प्रत्येक बार इन्हें शॉर्टलिस्टेड ही होने नहीं देती थी

फिर सवाल यह उठता है कि आखिर ऐसे क्या कारण थे कि जिस व्यक्ति को देशभर की दर्जनभर उच्च नामी प्रख्यात प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों ने नकार दिया हो उसे सिंधिया इंजीनियरिंग कॉलेज सोसायटी की चयन समिति ने एमआईटीएस का डायरेक्टर के पद पर नियुक्ति प्रदान की उससे भी हैरानीजनक तो यह है कि उनके इस चयन से पूर्व मध्यप्रदेश में ही इसी सिंधिया इंजीनियरिंग कॉलेज सोसायटी ने स्वयं विदिशा स्थित अपने अन्य इंजीनियरिंग शिक्षण संस्थान “सम्राट अशोक तकनीकी संस्थान” ने इनके द्वारा डायरेक्टर पद के लिए किए गए आवेदन को शैक्षणिक अयोग्यता के कारण इंटरव्यू के लिए बुलाने लायक ही नहीं समझा था

यही नहीं साल और तो और साल 2010 में इसी एमआईटीएस में भी डायरेक्टर के पद के लिए इनके आवेदन को प्रबंधन बोर्ड के सदस्यों ने रिजेक्ट किया था।

स्पष्ट है कि इस कॉलेज की प्रबंधन समिति ने साल 2016 में साहब की अवैध नियुक्ति करवाने के लिए किस तरह चेयरमैन केंद्रीयमंत्री सिंधिया से उक्त तथ्य छुपाए गए और उनके विश्वास को आघात पहुंचाया जिसके चलते दर्जनों बार अयोग्य घोषित हो चुके एक अयोग्य व्यक्ति जिसकी पूरा शैक्षणिक रिकॉर्ड कक्षा दसवीं में 44 प्रतिशत के साथ साथ दोयम दर्जे का रहा हो उसके हाथों इस प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थान की कमान दी और नतीजा अहंकार बढ़ता गया, संस्थान की प्रतिष्ठा प्रत्येक वर्ष गिरती चली गई।
बड़ा सवाल यह है कि आखिर क्या मजबूरी थी कि 2016 में डायरेक्टर पद के लिए मंगाये गए आवेदनों में से योग्य आवेदकों को दरकिनार कर दर्जनो शिक्षण संस्थानों से नकारे जा चुके खुद सिंधिया इंजीनियरिंग कॉलेज सोसायटी के बोर्ड ने एक बार एसएटीआई और एक बार एमआईटीएस सहित कुल दो बार जिस व्यक्ति को रिजेक्ट किया हो उसे उपकृत किया गया यह एक बड़ा सवाल है।
उससे भी बड़ा सवाल है कि चेयरमैन सिंधिया अब तो सब जानते हैं और अब तो सभी दस्तावेज मीडिया में शिकायतकर्ता एडवोकेट अवधेश तोमर द्वारा बाँटे जा चुके है कब इन्हें ससम्मान कार्यमुक्त करते हैं।
उल्लेखनीय है कि साहब और उनकी पत्नी दोनों संस्थान से सेवानिवृत तो पहले ही चुके हैं। लेखा शाखा से प्राप्त जानकारी अनुसार साहब ने स्वयं और स्वयं की धर्मपत्नी जिन्हें प्रो वीसी बना रखा है उनका भी ईपीएफओ खाते में नियम विरुद्ध फंड यथावत भेजा जा रहा है।
श्रीमंत ही बताएं MITS इंजीनियरिंग संस्थान है या कुलगुरु की हुकूमत…
मप्र हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अवधेश सिंह तोमर ने बताया कि अयोग्य अपात्र कुलगुरु आरके पंडित ने प्रधानमंत्री कार्यालय, राज्यपाल और केंद्रीय/प्रादेशिक जांच एजेंसियों की जांच के दौरान बिना किसी भय के शिक्षक भर्ती के साक्षात्कार ग्वालियर में नहीं बल्कि दिल्ली के पांच सितारा होटल में आयोजित करवाकर अनियमितताओं की श्रृंखला को आगे बढ़ाया और अब नियुक्ति भी दे डाली है। जबकि जांच एजेंसिया पूर्व में अनियमितताओं की सघन जांच में जुटी हुई है फिर भी बेधड़क होकर एक बार फिर अनियमितताओं को अंजाम दिया गया है। एडवोकेट श्री तोमर ने बताया कि ऐसे आवेदकों को इस शिक्षक भर्ती में नियुक्ति करवाई जा रही है जिनके पास पूर्ण शैक्षणिक दस्तावेज ही उपलब्ध नहीं है फिर सवाल यह उठता है कि संस्थान की स्क्रूटनी समिति, साक्षात्कार समिति, विषय विशेषज्ञों ने आखिर किस दबाव अथवा किन परिस्थितियों अथवा किन स्वार्थों के चलते योग्य आवेदकों को धोखा देकर ऐसे उम्मीदवार उनमें भी विशेषकर महिला उम्मीदवार को नियुक्ति देने का काम किया गया जिनके पास ओरिजनल शैक्षणिक दस्तावेज ही नहीं है साथ ही श्री तोमर ने कहा कि ऐसे उम्मीदवार भी नियुक्त किए है जिनकी मानद उपाधि अभी सिर्फ सबमिट ही हुई है कंपलीट नहीं हुई है, ऐसे एक दो नहीं दर्जनभर मामले उनके सामने आ चुके है।

आखिर क्या मजबूरी थी कि इन उम्मीदवारों के लिए पूर्ण दस्तावेज़ धारकों और आवेदन करने से पूर्व पूर्ण योग्यता रखने वाले उम्मीदवारों का चयन न करते हुए अपात्रों का चयन करना पड़ा। आखिर क्या मजबूरी थी सभी नियमों को तोड़कर मानद उपाधि विहीन उम्मीदवारों का चयन करना पड़ा।
शिकायतकर्ता अवधेश तोमर, अधिवक्ता मप्र हाईकोर्ट ने मीडिया को प्रमाण देते हुए कहा कि यदि अब आरके पंडित को कुलगुरु के पद से हटाया नहीं गया तो जल्द न्यायालय पहुंचेगा मामला:

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