ग्वालियर: सिंधिया राजपरिवार से जुड़े ‘बलवंत भैया’ की आलीशान कोठी कैसे बन गई शहर का सबसे डरावना खंडहर? जानें इसका इतिहास

ग्वालियर (मध्य प्रदेश)। तानसेन की नगरी और ऐतिहासिक किलों के लिए मशहूर ग्वालियर शहर के हरिशंकर पुरम इलाके में एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित एक पुरानी, वीरान इमारत आज भी लोगों के लिए कौतूहल और रहस्य का विषय बनी हुई है। दूर से देखने पर किसी भव्य महल जैसी दिखने वाली यह कोठी समय के थपेड़ों के कारण अब एक डरावने खंडहर में तब्दील हो चुकी है।
आसपास के स्थानीय निवासियों का मानना है कि इस कोठी में कुछ अजीब और रहस्यमयी अहसास होता है, जिसके चलते लोग अब दिन के उजाले में भी यहाँ अकेले जाने से कतराते हैं। इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि यह रहस्यमयी इमारत सिंधिया राजवंश से ताल्लुक रखने वाले ‘बलवंत राव’ की है, जिन्हें लोग आदर से ‘बलवंत भैया’ कहते थे।
कौन थे बलवंत भैया और क्या है इनका सिंधिया कनेक्शन?
वरिष्ठ इतिहासकारों के अनुसार, इस महलनुमा कोठी के मालिक बलवंत राव शिंदे का जन्म साल 1885 के आसपास हुआ था। वे तत्कालीन ग्वालियर नरेश महाराजा माधवराव सिंधिया (द्वितीय) के समकालीन थे:
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सीधे राजपरिवार से नहीं थे: बलवंत राव सिंधिया घराने से ताल्लुक तो रखते थे, लेकिन वे सीधे मुख्य राजपरिवार का हिस्सा नहीं थे। इसी वजह से उन्हें राजमहल में कोई आधिकारिक पद या खास स्थान तो नहीं मिला, लेकिन उनका रहन-सहन, शिक्षा और सुविधाएं किसी राजा से कम नहीं थीं।
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बेहतरीन आर्किटेक्ट और लेखक: बलवंत भैया बेहद पढ़े-लिखे, कला प्रेमी और आध्यात्मिक प्रवृत्ति के इंसान थे। उन्होंने ग्वालियर के इतिहास, कला और संस्कृति पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकें भी लिखी थीं। इसके साथ ही वे एक कुशल आर्किटेक्ट (वास्तुकार) भी थे, जिन्होंने ग्वालियर की कई ऐतिहासिक इमारतों की डिजाइनिंग में मुख्य भूमिका निभाई थी।
अकेलेपन और अध्यात्म के लिए चुनी थी वीरान पहाड़ी
बलवंत भैया ने जीवनभर विवाह नहीं किया था। वे दो भाई थे, जिनमें से एक भाई ग्वालियर से बाहर शिफ्ट हो गए थे, लेकिन बलवंत भैया ने ग्वालियर में ही रहने का फैसला किया। वर्तमान में जहां ‘हरिदर्शन स्कूल’ संचालित है, कभी वहां उनका मुख्य कार्यालय हुआ करता था:
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जंगल में बनाई थी कोठी: एकांत और अध्यात्म से जुड़ने के लिए उन्होंने तत्कालीन समय में मुख्य नगर से काफी दूर, एक ऊँची पहाड़ी पर चारों तरफ जंगलों के बीच अपने लिए यह आधुनिक कोठी बनवाई थी।
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आधुनिक सुविधाओं से लैस: इस कोठी को उन्होंने बेहद खास आर्किटेक्चर के साथ डिजाइन किया था, जहां रोशनी और हवा की बेहतरीन व्यवस्था थी। इसके परिसर में घोड़ों के लिए बड़ा अस्तबल और नौकरों के रहने के लिए अलग से क्वार्टर्स भी बनाए गए थे।
बलवंत भैया की कोठी: तब और अब की स्थिति
| पहलू | तत्कालीन स्थिति (इतिहास) | वर्तमान स्थिति (2026) |
| भौगोलिक स्थिति | शहर से दूर, घने जंगल और शांत पहाड़ी पर। | हरिशंकर पुरम की घनी आबादी के बीच स्थित पहाड़ी। |
| स्वरूप | रोशनी, हवा और अस्तबल से सुसज्जित आधुनिक महल। | झाड़ियों से घिरा वीरान खंडहर। |
| पहचान | कला, इतिहास और अध्यात्म का मुख्य केंद्र। | शहर की सबसे चर्चित ‘डरावनी’ जगहों में शामिल। |
दिन में भी जाने से क्यों डरते हैं लोग?
कभी आसमान के तारे की तरह चमकने वाली बलवंत भैया की यह भव्य कोठी आज पूरी तरह सुनसान हो चुकी है। इसके आसपास अब बड़ी-बड़ी कॉलोनियां और आबादी बस चुकी है, लेकिन फिर भी लोग इस पहाड़ी पर चढ़ने से कतराते हैं:
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अजीब सा अहसास: स्थानीय लोगों का कहना है कि इस खंडहर के पास जाने पर कई बार किसी की मौजूदगी का अहसास (Negative Energy या पैरानॉर्मल एक्टिविटी) होता है। ऐसा लगता है जैसे कोई उन्हें वहां से दूर रहने की चेतावनी दे रहा हो।
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असामाजिक तत्वों का डेरा: रखरखाव न होने और देखरेख के अभाव में इस ऐतिहासिक धरोहर को कुछ असामाजिक तत्वों ने भी काफी नुकसान पहुंचाया है, जिससे इसकी बनावट और ज्यादा डरावनी नजर आने लगी है।
इतिहासकारों का मत: इतिहासकारों का मानना है कि बलवंत भैया को इस कोठी से और अपने अकेलेपन से बहुत गहरा लगाव था। उनके निधन के बाद वारिसों के न होने से यह संपत्ति वीरान हो गई। लोगों का यह डर केवल एक मानसिक भ्रम या एकांत जगह का खौफ भी हो सकता है, लेकिन यह सच है कि यह खंडहर आज भी बलवंत भैया की कुशल कार्यशैली और उनके अकेलेपन की गवाही चीख-चीख कर दे रहा है।



