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MITS प्रकरण में जांच एजेंसियों का कसता शिकंजा, क्या उच्च प्रबंधन लेगा समय रहते संज्ञान

MITS कुलगुरु की अवैध नियुक्ति एवं उनके द्वारा पद का दुरपयोग करने, भ्रष्टाचार के कई मामलों में लिप्त होने व लगातार अनियमितताओं को अंजाम देने से संबंधित प्रमाण सहित अलग अलग शिकायतें शिकायतकर्ता एडवोकेट अवधेश सिंह तोमर द्वारा प्रधानमंत्री कार्यकाल से लेकर राज्यपाल एवं कई केंद्रीय एजेंसियों को की गई थी।
इस मामले में नई खबर सामने निकल कर यह आ रही है कि इस मामले में अलग अलग जांच एजेंसियों ने अपने अपने स्तर पर प्रकरण को जांच हेतु स्वीकृत कर जांच की प्रक्रिया को आरंभ कर दिया है।

जांच एजेंसियों को जांच का घेरा अब कसता जा रहा है देखना यह होगा कि महोदय स्वयं इस्तीफा देंगे अथवा अब तक की परंपरा अनुसार उच्च प्रबंधन इनसे इस्तीफा लेगा। संस्थान से जुड़े लोग इससे पूर्व भी संस्थान के चेयरमैन सहित संचालन समिति के प्रत्येक सदस्य से मिलकर, लिखित, ईमेल के माध्यम से अपनी दुख तकलीफें बता चुके है लेकिन प्रबंधन न जाने किस क्रिया में बांधा गया है जिसके कारण साहब के कर्मकाण्ड से संचालन समिति ही नहीं महल की प्रतिष्ठा पर भी बातें होने के बावजूद साहब पर कभी कोई एक्शन देखने को नहीं मिला जिसके कारण साहब लगतार निरंकुश होते गए हालांकि संस्थान से जुड़े लोगों को उच्च प्रबंधन से अब भी उम्मीद है कि वह स्वयं भ्रष्टाचार में सिर से पैर तक डूबे विवादित अवैध कुलगुरु से श्रीमंत सिंधिया इस्तीफा ले लेंगे परंतु कुलगुरु महोदय देर शाम से मध्यरात्रि तक चलने वाली रंगीन बैठकों में मदहोशी से सराबोर होकर अब भी यही कहते सुने जा रहे हैं कि मेरा कोई बाल बाँका नहीं कर सकता। वहीं खबर यह भी है कि साहब अब क्रिया अनुष्ठानों का सहारा भी ले रहे है और न्याय के देवता शनि देव के मंदिर भी हो आए है लेकिन साहब शायद भूल गए हो शनि देव न्याय के देवता है हिसाब तो बराबर करेंगे ही चाहे भ्रष्टाचार की कमाई से भंडारा भी करा लें।

मप्र उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अभिभाषक अवधेश सिंह तोमर ने कहा कि किसी भी विश्विद्यालय के कुलगुरु के लिए आवश्यक शैक्षणिक योग्यता श्री आरके पण्डित के पास है ही नहीं क्योंकि कक्षा 10 में उनके 44 प्रतिशत, कक्षा 12 में 60 प्रतिशत, बैचलर ऑफ आर्किटेक्चर में 58 प्रतिशत मार्क्स जहां उनके दोयम दर्जे की शैक्षणिक रिकॉर्ड है वहीं आर्किटेक्चर छोड़ सिविल इंजीनियरिंग में कंस्ट्रक्शन मैनेजमेंट में एमई और एमई करने के लगभग 8 साल बाद सिविल के ही कंस्ट्रक्शन मैनेजमेंट में उनको मानद उपाधि डॉक्टर आर.एन मुंशी जी की बदौलत मिल सकी थी इस तरह इन महाशय का दोयम दर्जे के शैक्षणिक रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि उनकी निदेशक पद पर नियुक्ति ही अवैध थी। इनके द्वारा अकाउंट शाखा एक अदने से बाबू धर्मेन्द्र गोरखपुरी को तमाम नियम कायदों को दरकिनार अहर्ताओं को शिथिल कर कई योग्य आवेदकों को भी नजरअंदाज कर विशेष कारणों से फाइनेंस कम अकाउंट ऑफिसर बनाया गया था यही धर्मेंद्र गोरखपुरी इनके सारे घोटालों के तहखानों की मुख्य चाबी है इनकी शिकायत भी प्रमाण सहित की गई है।

उल्लेखनीय है कि निदेशक पद पर अधिकतम दो कार्यकाल पूर्ण करने उपरांत एमआईटीएस के इतिहास में महोदय ने अपने तिलस्म के मायाजाल से पहली बार लगातार तीसरा कार्यकाल बिना ओपन सिलेक्शन के स्वीकृत करवा लिया था। इसी तीसरे कार्यकाल में इस संस्थान की संचालन समिति के चेयरमैन एवं जनसेवक, केन्द्रीयमंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने विशेष प्रयासों से इस संस्थान उच्च शिक्षा विभाग भारत सरकार से डीम्ड विश्विद्यालय का दर्जा दिला दिया जो न सिर्फ एमआईटीएस बल्कि पूरे ग्वालियर के लिए गौरव का विषय है क्योंकि सिंधिया राजवंश द्वारा स्थापित एमआईटीएस संस्थान से निकले इंजीनियर देश विदेश में अपनी कार्य कुशलता से ग्वालियर की शान बढ़ा रहे हैं।

यह संस्थान डीम्ड विश्विद्यालय तो बना परंतु लगभग तीन साल बीत जाने के बाद भी इस डीम्ड विश्विद्यालय के उच्च प्रबंधन ने ओपन सिलेक्शन से कुलगुरु की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू क्यों नहीं की जा सकी यह भी बड़ा आश्चर्यजनक है क्योंकि यूजीसी का नियम है कि जब किसी संस्थान को डीम्ड विश्विद्यालय का दर्जा दिया जाता है तो अधिकतम 6 महीने के अंदर ओपन सिलेक्शन के माध्यम से कुलगुरु की नियुक्ति की जाना अतिआवश्यक है परंतु लगातार तीन कार्यकाल निदेशक रह चुके स्वयं भू कुलगुरु महोदय ने मानो जैसे अपने तिलिस्म में उच्च प्रबंधन को इस प्रकार जकड़ लिया है कि प्रक्रिया आरंभ करने से संबंधित विज्ञापन ही 3 साल बीत जाने के बाद नहीं जारी किया गया है।

वहीं सचिव महोदय के हस्ताक्षर से साहब ने स्वयं का नियम विरुद्ध बिना किसी समिति के गठन किये बिना किसी अनुशंसा के Higher Pay Grade 10 हजार से बढ़वाकर 12 हजार करवा लिया था 2 हजार रु ग्रेड पे स्केल बढ़ाए जाने से इनके वेतन में 60 हजार रु तक की मासिक वृद्धि का अतिरिक्त आर्थिक भार संस्था पर डाला गया जिसका विगत 12 वर्षों में योग देखें तो लगभग 1 करोड़ रु से अधिक व ब्याज अतिरिक्त होगा। इससे पूर्व भी मानद उपाधि का इंक्रीमेंट भी गुमराह कर 12 हजार का हायर पे ग्रेड हासिल किया जो सिर्फ ऐसे प्रोफेसर को ही मिलता है जिनका उच्च कोटि का शोध अनुभव रहा हो, महोदय ने नियमों से अनभिज्ञ सचिव महोदय का बखूबी फायदा उठाते हुए उनसे इस संबध में 6 जनवरी 2016 के गजट नोटिफिकेशन के भाग III के खंड 4 के क्रम संख्या 32 के नियम का साफ़ साफ़ उल्लंघन करवाया जिसमे ये साफ़ साफ बताया गया है कि इसके लिए हकदार उमीदवारों के को यह लाभ देने के लिए उच्च स्तरीय समिति का गठन होगा, तथा ये सिर्फ 10 प्रतिशत प्रोफेसर को ही दी जाएगी और जिनके पास पोस्ट डोक्टोरल अनुभव होगा जबकि AUTHENTIC,SCOPUS( https://www.scopus.com/freelookup/form/author.uri पर तो इनका कोई डाटा ही उपलब्ध नहीं थाI वहीं गूगल स्कॉलर (https://scholar.google.co.in/) पर इनका H इंडेक्स (5) मिला जो मानक दृष्टि से काफी कम हैं, यहाँ mits के कम से कम 20 प्रोफेसर का h इंडेक्स इनसे ज्यादा है जबकि साहब के CITATION देखे तो जानकारी मिली कि महोदय को सिर्फ 28 साइटेशन वर्ष 2000 में सिर्फ एक पेपर से मिले थे वो भी पार्टनरशिप में वो भी आर्किटेक्ट के होके सिविल के काम में बताइए कितनी धांधली मचाई और
इस फर्जीवाड़े से प्रबंधन को अधेरे में रखकर अपना वेतमान बढ़वा लिया। ज्ञात हो की mits एक शासकीय अनुदान प्राप्त संस्था हैं जिसे शासन से करोडो रु प्राप्त अनुदान मिलता है I इस तरह खुद का वेतन बढ़वाकर शासकीय धन का दुरूपयोग हैI

यही नहीं पूर्व में तत्कालीन निदेशक ने इनके विरुद्ध रिकवरी नोटिस निकाला था परंतु आज दिनांक तक भी उक्त रिकवरी नहीं की गई बल्कि हायर पे ग्रेड में वृद्धि करवाकर स्वयं आर्थिक लाभ प्राप्त किया गया शहर के एक बड़े उद्योगपति एल्युमिनाई ने बताया कि पूर्व छात्रों की एल्यूमिनाई अशोशियन से फंड लेने के लिए इनके द्वारा अशोभनीय तरीके से फंड की कमी जाहिर करते हुए राजपरिवार द्वारा फंड देने की बजाय संस्थान से फंड लेने की बात महोदय द्वारा कही जाती हैं।

संस्थान से जुड़े प्रबुद्धजन बताते है कि उच्च प्रबंधन साहब के आगे घुटने क्यों टेककर बैठा है यह विचित्र है फिर भी उन्होंने उम्मीद जताई है कि एमआईटीएस उच्च प्रबंधन से जुड़े चेयरमैन श्रीमंत सिंधिया सहित, सचिव एवं एक्जिक्यूटिव बोर्ड मेंबर्स से वह समय रहते उचित निर्णय लेकर इनसे अवश्य शीघ्र इस्तीफा लेंगे। हालांकि महोदय स्वयं स्वेच्छा से इस्तीफा दे दें इसकी उम्मीद इनसे नहीं की जा सकती।

महोदय की अवैध नियुक्ति ही नहीं बल्कि अनुदान, फीस, बिल्डिंग निर्माण, सिक्यूरिटी और मैस, कैंटीन के ठेकों, खरीद फरोख्त में धांधली एवं नियुक्ति प्रक्रिया में धांधली कर भ्रष्टाचार के कई मामलों के प्रमाण शिकायतकर्ता द्वारा जांच एजेंसियों को दिए जा चुके है अब देखना यह होगा कि एमआईटीएस उच्च प्रबंधन कब इनके तिलिस्म से बाहर निकलकर इनकी रवानगी तय करता है अथवा इनके ही तिलस्म में फंसा रहता है।

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