एमपी में 21 साल बाद सड़कों पर लौटेंगी सरकारी बसें: खत्म होगा प्राइवेट ऑपरेटर्स का एकाधिकार, जानिए क्यों बंद हुआ था रोडवेज और क्या है ‘मोहन सरकार’ का मास्टर प्लान

भोपाल। मध्य प्रदेश के सार्वजनिक परिवहन क्षेत्र से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है। राज्य की सड़कों पर पिछले 21 सालों से जारी निजी बस संचालकों (Private Bus Operators) का एकाधिकार अब खत्म होने जा रहा है। मध्य प्रदेश की डॉ. मोहन यादव सरकार ने दो दशकों से ठप पड़ी सरकारी बस सेवा को दोबारा बहाल करने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। परिवहन विभाग को इस पूरी महत्वाकांक्षी योजना का खाका तैयार करने के सख्त निर्देश दे दिए गए हैं।
‘मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा’ के तहत होगी वापसी
माना जा रहा है कि सरकार इस बार ‘मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा’ के बैनर तले सरकारी बसों को प्रदेश के कोने-कोने में दौड़ाने की तैयारी कर रही है। इस नए कदम से आम जनता और मध्यमवर्गीय परिवारों को एक बार फिर सुरक्षित, सुलभ और किफायती सफर की सौगात मिलने की उम्मीद जगी है।
इनसाइड स्टोरी: रातों-रात क्यों गायब हुई थीं सरकारी बसें?
मध्य प्रदेश की सड़कों पर आज जो निजी बसों का दबदबा दिखाई देता है, उसकी पटकथा वास्तव में साल 1990 के दशक में ही लिखी जाने लगी थी।
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कंडक्टर सरकारी, बस प्राइवेट: साल 2000 से पहले मध्य प्रदेश परिवहन निगम की कई बसों को चरणबद्ध तरीके से बेचा गया। इसके बाद सरकार ने निजी बस मालिकों के साथ एक अनोखा अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) किया। इस अजीबोगरीब व्यवस्था में बस और ड्राइवर तो प्राइवेट होते थे, लेकिन टिकट काटने वाला कंडक्टर रोडवेज यानी मध्य प्रदेश सरकार का सरकारी कर्मचारी होता था, जिसे सरकार वेतन देती थी।
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फंडिंग पर रोक और भारी घाटा: मध्य प्रदेश सड़क परिवहन निगम में केंद्र सरकार की हिस्सेदारी 29.5% और राज्य सरकार की हिस्सेदारी 70.5% थी। वक्त के साथ राज्य सरकार ने अपने हिस्से का बजट और फंड देना बंद कर दिया, जिसके चलते निगम भारी-भरकम घाटे के दलदल में धंसता चला गया। जनवरी 2005 में निजी बस मालिकों के साथ हुआ वह अनुबंध भी समाप्त हो गया।
2005 का वो ‘सफेद हाथी’ फैसला: जब सरकार के पास थे 3 विकल्प
परिवहन निगम को हमेशा के लिए ताला लगाने से पहले तत्कालीन बाबूलाल गौर सरकार के पास इस संकट से उबरने के लिए तीन रास्ते मौजूद थे:
| विकल्प | योजना का स्वरूप | अनुमानित खर्च | सरकार का फैसला |
| पहला विकल्प | एक छोटे और सीमित सेटअप के साथ बसों का संचालन जारी रखना। | ₹900 करोड़ | खारिज किया |
| दूसरा विकल्प | परिवहन निगम को पुनर्जीवित कर इसे पूर्ण और आधुनिक स्वरूप में चलाना। | ₹1400 करोड़ | खारिज किया |
| तीसरा विकल्प | निगम को पूरी तरह से बंद कर कर्मचारियों को वीआरएस (VRS) देना। | ₹1600 करोड़ | सरकार ने इसे चुना |
प्रबंधन और घाटे से परेशान तत्कालीन सरकार ने जनवरी 2005 में सबसे खर्चीले यानी तीसरे विकल्प को चुना। सरकार ने कर्मचारियों को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) देकर मध्य प्रदेश में सरकारी बसों के पहियों पर हमेशा के लिए ब्रेक लगा दिया था, जिसे एक बड़ा नीतिगत मोड़ माना गया।
बंद होने का जनता और कर्मचारियों पर क्या हुआ असर?
रोडवेज बस सेवा के अचानक बंद होने का सबसे सीधा और तगड़ा झटका प्रदेश के उन लाखों दैनिक यात्रियों और मध्यमवर्गीय परिवारों को लगा, जो निजी ऑपरेटरों की मनमानी से दूर एक सुरक्षित और सस्ते सफर के लिए सरकारी बसों पर आश्रित थे। इसके अलावा, हजारों कर्मचारियों को समय से पहले जबरन वीआरएस लेना पड़ा, जिससे उनके परिवारों के सामने अचानक आर्थिक संकट खड़ा हो गया था।
अब 21 साल बाद, मोहन सरकार इस पुराने घाटे वाले मॉडल को पीछे छोड़कर पीपीपी (PPP) या किसी नए सुदृढ़ मॉडल के साथ सरकारी बसों को उतारने जा रही है, जिससे राज्य के परिवहन ढांचे में एक बड़ा क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिल सकता है।


