ग्वालियर हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: ‘पब्लिक ट्रस्ट किसी की निजी जागीर नहीं’; अचलेश्वर महादेव मंदिर की पुरानी कार्यकारिणी बेदखल, 6 महीने में चुनाव कराने के आदेश

ग्वालियर (मध्य प्रदेश): मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ ने अंचल के सुप्रसिद्ध और करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र श्री अचलेश्वर महादेव सार्वजनिक न्यास (मंदिर ट्रस्ट) की संपत्ति में हेरफेर और कुप्रबंधन को लेकर एक बेहद कड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। माननीय न्यायमूर्ति आशीष श्रोती की एकलपीठ ने निचली अदालत (10वें जिला न्यायाधीश) के उस पुराने आदेश को पूरी तरह ‘गैर-कानूनी’ और ‘शून्य’ घोषित करते हुए पलट दिया है, जिसने तकनीकी कमियों का बहाना बनाकर ट्रस्ट की जांच रिपोर्ट को खारिज कर दिया था।
हाई कोर्ट ने अपनी तल्ख टिप्पणी में स्पष्ट किया कि किसी भी पब्लिक ट्रस्ट की संपत्ति समाज के कल्याण और धार्मिक कार्यों के लिए होती है, न कि कुछ रसूखदारों के निजी मुनाफे के लिए। इसके साथ ही कोर्ट ने जिला प्रशासन और न्यायपालिका को न्यास की संपत्तियों की सुरक्षा करने की उनकी मूल कानूनी जिम्मेदारी भी याद दिलाई।
निचली अदालत का फैसला निरस्त, पूर्व कार्यकारिणी की ‘अवैध’ बहाली रद्द
निचली अदालत ने 15 नवंबर 2022 को अपने एक आदेश में कलेक्टर/पंजीयक द्वारा भेजी गई जांच रिपोर्ट को तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया था। इसके साथ ही अदालत ने उस पुरानी कार्यकारिणी को दोबारा काम करने की इजाजत दे दी थी, जिसका कार्यकाल सालों पहले खत्म हो चुका था।
हाई कोर्ट ने इस पर गहरी नाराजगी व्यक्त करते हुए अपने आदेश में कहा:
“जब अचलेश्वर महादेव ट्रस्ट की इस कार्यकारिणी का चुनाव आखिरी बार साल 2017 में हुआ था और इसका निर्धारित दो साल का कार्यकाल 2019 में ही समाप्त हो गया, तो बिना किसी नए और वैध चुनाव के यह कार्यकारिणी अवैध रूप से काम कर रही थी। निचली अदालत द्वारा उन्हें दोबारा पद पर बिठाने का निर्णय पूरी तरह त्रुटिपूर्ण और नियमों के विरुद्ध था।”
इस सख्त आदेश के बाद हाई कोर्ट ने पुरानी कार्यकारिणी को काम करने की दी गई सभी अनुमतियों को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर उन्हें ट्रस्ट से बेदखल कर दिया है।
कैसे खुला कुप्रबंधन का राज? (पूरा मामला एक नजर में)
अचलेश्वर मंदिर ट्रस्ट के भीतर चल रही वित्तीय गड़बड़ियों का मामला सिलसिलेवार ढंग से सामने आया:
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भक्त की शिकायत: शिव भक्त और सामाजिक कार्यकर्ता संतोष सिंह राठौर ने मंदिर ट्रस्ट की संपत्तियों और फंड में भारी हेरफेर व कुप्रबंधन को देखते हुए पंजीयक (पब्लिक ट्रस्ट) के समक्ष पुख्ता सबूतों के साथ शिकायत दर्ज कराई थी।
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ऑडिट में खुली पोल: हाई कोर्ट के पिछले निर्देशों के बाद जब संयुक्त निदेशक (कोष एवं लेखा) की टीम ने मंदिर के खातों का विस्तृत ऑडिट किया, तो वित्तीय अनियमितताओं और चढ़ावे के पैसों के दुरुपयोग का एक बड़ा पुलिंदा उजागर हुआ।
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कार्यकारी न्यासी का इस्तीफा: इसी बीच, साल 2017-2019 की कार्यकारिणी के कार्यकारी न्यासी नरेंद्र कुमार सिंघल ने भी ट्रस्ट के भीतर चल रही अवैध गतिविधियों और मनमानी से तंग आकर 2019 में ही अपने पद से इस्तीफा दे दिया था और इसकी लिखित जानकारी पंजीयक को सौंप दी थी।
हाई कोर्ट के 3 कड़े निर्देश: 6 महीने में निपटेगा विवाद
उच्च न्यायालय ने मामले की संवेदनशीलता, करोड़ों की संपत्ति की सुरक्षा और इसकी लंबी पेंडेंसी को देखते हुए निम्नलिखित कड़े और समयबद्ध निर्देश जारी किए हैं:
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नया रिसीवर/प्रबंधन रहेगा प्रभावी: कोर्ट ने निर्देश दिया है कि जब तक मामले का अंतिम निपटारा नहीं हो जाता, तब तक पूर्व में कोर्ट द्वारा की गई वैकल्पिक व्यवस्था (रिसीवर या आधिकारिक प्रबंधन समिति) सुचारू रूप से लागू रहेगी, ताकि मंदिर की दैनिक व्यवस्था और सुरक्षा में कोई बाधा न आए।
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6 महीने की समय-सीमा: प्रधान जिला न्यायाधीश, ग्वालियर को आदेश दिया गया है कि वे इस संवेदनशील मामले को तुरंत किसी सक्षम पीठासीन अधिकारी को सौंपें, जो आगामी 6 महीनों के भीतर पूरी सुनवाई प्रक्रिया को मुकम्मल कर अंतिम फैसला सुनाए।
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पारदर्शी चुनाव कराने का आदेश: हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि तय नियमों और कानून के मुताबिक अचलेश्वर महादेव न्यास की नई कार्यकारिणी का गठन करने के लिए बेहद पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से जल्द से जल्द चुनाव संपन्न कराए जाएं।
उच्च न्यायालय के इस कड़े रुख के बाद ग्वालियर के अचलेश्वर महादेव मंदिर की करोड़ों की बेकीमती जमीन और फंड पर कुंडली मारकर बैठे रसूखदारों को तगड़ा झटका लगा है। इस आदेश से अब मंदिर के चढ़ावे और पैसों का दुरुपयोग करने वालों पर कानूनी शिकंजा कसना पूरी तरह तय हो गया है।




