चंबल में सामाजिक क्रांति के प्रणेता: संत हरिगिर महाराज को ‘पद्म विभूषण’ देने की मांग, 14 जिलों से खत्म कीं 3 बड़ी कुरीतियां

ग्वालियर/मुरैना: चंबल का नाम सुनते ही कभी जेहन में बागियों और बंदूकों की गूंज सुनाई देती थी, लेकिन इसी चंबल की माटी से पिछले कई दशकों से सामाजिक सुधार की एक ऐसी मूक क्रांति चल रही है जिसने लाखों परिवारों की तकदीर बदल दी है। तीन राज्यों (मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश) के 14 जिलों में शराब, दहेज और मृत्युभोज जैसी सदियों पुरानी कुरीतियों को जड़ से उखाड़ फेंकने वाले परम त्यागी संत शिरोमणि श्री श्री 1008 हरिगिर महाराज जी को अब ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित करने की मांग उठ रही है।
महाराज जी ने अपनी 70 से अधिक ऐतिहासिक महापंचायतों के जरिए समाज को कर्ज, घरेलू हिंसा और अशिक्षा के दलदल से बाहर निकाला है। आइए जानते हैं चंबल के इस महान लोकहितवादी संत के जमीनी बदलाव की पूरी कहानी:
मृत्युभोज बंदी (2011 से 2016): जमीनों को बिकने से बचाया
एक समय था जब चंबल क्षेत्र में मृत्युभोज के नाम पर दिखावा चरम पर था। हर परिवार में लगभग 100 बोरी शक्कर लगती थी, जिससे गरीब परिवार लाखों के कर्ज में डूब जाते थे और जमीनें तक बिक जाती थीं।
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बदलाव: महाराज जी की महापंचायतों के बाद इस फिजूलखर्ची को महज ‘पॉच मन पुआ’ तक सीमित कर दिया गया। इससे सर्व समाज, विशेषकर गुर्जर समाज को कर्ज और गरीबी के कुचक्र से मुक्ति मिली।
शराब बंदी अभियान (2016 से 2018): थमी घरेलू हिंसा और दुर्घटनाएं
चंबल के गांवों और शहरों में शराब के कारण बर्बाद हो रहे परिवारों को बचाने के लिए महाराज जी ने गांव-गांव अलख जगाई।
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बदलाव: उनके प्रभाव में आकर लाखों लोगों ने हमेशा के लिए शराब छोड़ दी। इसके प्रत्यक्ष परिणाम के रूप में क्षेत्र में घरेलू हिंसा, सड़क दुर्घटनाओं और आपसी झगड़ों में भारी कमी दर्ज की गई।
दहेज बंदी और कन्या भ्रूण हत्या पर प्रहार (2018 से निरंतर)
दहेज प्रथा के खिलाफ महाराज जी के अभियान का युवाओं और बुजुर्गों पर गहरा असर पड़ा।
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बदलाव: हजारों युवाओं ने बिना दहेज शादी करने की शपथ ली। समाज में बेटियों को बोझ समझना कम हुआ, जिससे कन्या भ्रूण हत्या के मामलों में गिरावट आई और परिवारों में मधुरता बढ़ी।
चंबल किनारे 55 वर्षों से तपस्यारत हैं महाराज जी: संक्षिप्त जीवन परिचय
संत शिरोमणि हरिगिर महाराज जी का जीवन आत्मत्याग की मिसाल है:
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बाल्यकाल में संन्यास: मात्र 14 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने ‘श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा’ के नागा साधु पंथ में श्री श्री 1008 श्री भीकमगिर बाबा के सान्निध्य में दीक्षा ली थी।
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55 वर्षों की अखंड तपस्या: लगभग 70 वर्षीय महाराज जी पिछले 55 सालों से धौलपुर (राजस्थान) के मोरोली गांव के पास ‘बड़े पुरा’ में चंबल किनारे अपनी कुटिया में तपस्यारत हैं।
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दस्यु उन्मूलन में भूमिका: चंबल में डकैत समस्या के दौर में उन्होंने मुरैना (म०प्र०) और धौलपुर (राजस्थान) के बीहड़ों व गांवों में शिक्षा और मुख्यधारा से जुड़ने की अलख जगाई थी।
गौ-सेवा से लेकर शिक्षा तक: जमीनी स्तर पर फैला नेटवर्क
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गौ-संरक्षण (2002-2010): महाराज जी ने धौलपुर में कसाईखाने को खुलने से रोका और चंबल क्षेत्र के ढाबों व होटलों में शाकाहारी भोजन को प्राथमिकता दिलवाई।
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निःशुल्क शिक्षा: साल 2022 से ग्वालियर के डी.डी. नगर (चावला मार्केट के पास) गरीब बच्चों के लिए एक पूर्णतः निःशुल्क छात्रावास संचालित किया जा रहा है।
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शिष्यों की फौज: इस अभियान को घर-घर पहुंचाने में उनके प्रमुख शिष्य—श्री श्री महादेवगिर महाराज, श्री श्री लालगिर महाराज, श्री श्री जनवेदगिर महाराज, श्री श्री गोविंद गिरि महाराज, श्री श्री भरत गिरि महाराज समेत 18 संतों और हजारों युवाओं की कमेटियों ने कंधे से कंधा मिलाकर काम किया है।
राष्ट्रीय मीडिया और राजनेताओं ने भी सराहा
महाराज जी के इस जमीनी सुधार की गूंज देश की संसद से लेकर राष्ट्रीय मीडिया तक रही है:
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‘इंडिया टुडे’ में चर्चा: साल 2023 में प्रसिद्ध पत्रकार सौरभ द्विवेदी (द लल्लनटॉप) को दिए इंटरव्यू में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और सांसद श्री वी.डी. शर्मा ने महाराज जी के इन अभियानों की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी।
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राष्ट्रीय मीडिया कवरेज: साल 2017 में एबीपी न्यूज ने अपने प्रसिद्ध कार्यक्रम ‘घंटी बजाओ’ में महाराज जी की सामाजिक क्रांति पर विशेष ग्राउंड रिपोर्ट दिखाई थी।
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दिग्गजों की मौजूदगी: उनकी महापंचायतों में पूर्व मंत्री श्री रुस्तम सिंह, वर्तमान राज्यसभा सांसद श्री बंशी लाल गुर्जर, और म०प्र० के कृषि मंत्री श्री ऐदल सिंह कंसाना समेत कई जनपदों के विधायकों और सांसदों ने शिरकत कर इस मुहिम का समर्थन किया है।
चंबल की धरती को अपराध से निकालकर विकास और आत्मसम्मान की राह पर ले जाने वाले ऐसे महान राष्ट्र निर्माता संत को ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया जाना पूरे क्षेत्र का गौरव बढ़ाएगा




