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सीएमएचओ का औचक, निरीक्षण या औपचारिक खानापूर्ति ?…

जिला चिकित्सालय और बिरला नगर प्रसूति गृह में, हकीकत से दूर दिखी “सब ठीक” की रिपोर्ट...

सीएमएचओ का औचक, निरीक्षण या औपचारिक खानापूर्ति ?…

जिला चिकित्सालय और बिरला नगर प्रसूति गृह में, हकीकत से दूर दिखी “सब ठीक” की रिपोर्ट…

           गिर्राज रजक, ग्वालियर,

ग्वालियर:- कलेक्टर के निर्देशन में स्वास्थ्य सेवाएं “संचालित” होने के दावों के बीच सोमवार को सीएमएचओ डॉ. सचिन श्रीवास्तव द्वारा जिला चिकित्सालय मुरार और बिरला नगर प्रसूति गृह का औचक निरीक्षण किया गया, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह निरीक्षण वास्तव में जमीनी सच्चाई जानने के लिए था, या फिर पहले से तय स्क्रिप्ट के मुताबिक एक औपचारिक दौरा ?…

निरीक्षण से पहले, सतर्क हुआ अमला ?…

स्थानीय सूत्रों का कहना है कि सीएमएचओ के पहुंचने से पहले ही संबंधित अस्पतालों में स्टाफ को सतर्क कर दिया गया था, जिसके चलते निरीक्षण के समय डॉक्टर और कर्मचारी “पूरा” मिले। सवाल यह उठता है कि जो स्टाफ आम दिनों में नदारद रहता है, वह निरीक्षण के वक्त अचानक कैसे उपस्थित हो जाता है ?…

मरीजों की मजबूरी को, बताया गया संतोष…?

निरीक्षण के दौरान जिन मरीजों से “संतुष्टि” की बात कही गई, वही मरीज निजी तौर पर यह स्वीकार करते हैं कि…

दवाइयों के लिए बाहर से, खरीदारी करनी पड़ती है…

जांचों में, देरी आम बात है…

डॉक्टरों से समय पर, संवाद मुश्किल होता है…

तो फिर यह संतोष, किस आधार पर दर्ज किया गया ?…

 

क्या मरीजों की वास्तविक शिकायतें सुनी गईं या सिर्फ, औपचारिक सवाल-जवाब कर रिपोर्ट तैयार कर ली गई ?…

प्रसूति गृह बिरला नगर, दावा और हकीकत में फर्क…

प्रसूति गृह बिरला नगर में गर्भवती और धात्री महिलाओं से बातचीत का हवाला दिया गया, लेकिन हकीकत यह है कि…

कई महिलाओं को अल्ट्रासाउंड और पैथोलॉजी जांच, के लिए बाहर भेजा जाता है…

स्टाफ की संख्या, जरूरत से कम है…

रात की ड्यूटी में डॉक्टरों की उपलब्धता, सवालों के घेरे में रहती है…

फोन कर बुलाने के दावे पर भी सवाल उठते हैं—क्या यह व्यवस्था सभी, महिलाओं के लिए समान रूप से लागू है या सिर्फ चुनिंदा मामलों तक सीमित ?…

साफ-सफाई “दिखाने” तक सीमित ?…

निरीक्षण के वक्त साफ-सफाई बेहतर बताई गई, लेकिन आम दिनों में अस्पताल परिसर में…

गंदगी

बदबू

बायो मेडिकल वेस्ट के, अव्यवस्थित निपटान…

की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं…

तो क्या निरीक्षण सिर्फ उसी दिन के लिए, व्यवस्था चमकाई गई थी ?…

जवाबदेही तय करने से, क्यों बचता है विभाग ?…

सब कुछ “ठीक” बताकर, स्वास्थ्य विभाग हर बार…

शिकायतों से, बच निकलता है…

जिम्मेदार अधिकारियों पर, कार्रवाई से बचता है…

और व्यवस्थाओं में सुधार की, जरूरत को नजरअंदाज करता है…

सब ठीक है की, रिपोर्ट से किसे फायदा ?…

इस तरह के निरीक्षणों से न तो स्वास्थ्य सेवाएं सुधरती हैं, न ही आम मरीज को राहत मिलती है। फायदा अगर किसी को होता है तो सिर्फ फाइलों में बेहतर रिपोर्ट दर्ज कराने वाले अधिकारियों को।

अब बड़ा सवाल, यह है कि…

क्या कलेक्टर स्तर से इन अस्पतालों की वास्तविक, बिना सूचना की जांच होगी ?…

या फिर “सब ठीक है” की रिपोर्ट के सहारे, व्यवस्था यूं ही चलती रहेगी?…

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