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ग्वालियर फर्जी पदोन्नति कांड में, घिरा नगर निगम… लोकायुक्त ने रिपोर्ट को बताया ‘तथ्यहीन’ — कमिश्नर और अफसरों पर बढ़ा दबाव…

ग्वालियर फर्जी पदोन्नति कांड में, घिरा नगर निगम… लोकायुक्त ने रिपोर्ट को बताया ‘तथ्यहीन’ — कमिश्नर और अफसरों पर बढ़ा दबाव..

            गिर्राज रजक, ग्वालियर,

ग्वालियर नगर निगम एक बार फिर गंभीर आरोपों के घेरे में है। कर्मचारी नीरज श्रीवास्तव की कथित फर्जी पदोन्नति और नियम विरुद्ध लाभ देने के मामले में लोकायुक्त ने निगम की पेश की गई जांच रिपोर्ट को सीधे तौर पर “तथ्यहीन और अस्पष्ट” करार देकर खारिज कर दिया है। इस फटकार के बाद निगम प्रशासन की कार्यप्रणाली और अफसरों की भूमिका पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।

लोकायुक्त संगठन ने 6 जनवरी 2026 को निगम द्वारा दिए गए जवाब पर नाराजगी जताते हुए साफ कहा कि रिपोर्ट में न तो तकनीकी विसंगतियों का स्पष्ट जवाब है और न ही मुख्य आरोपों पर ठोस तथ्य रखे गए हैं। इसे मामले को दबाने और घुमाने की कोशिश माना गया। लोकायुक्त ने निगम को दोबारा विस्तृत और तथ्यपूर्ण जवाब देने के लिए एक महीने का समय दिया था, जिसकी मियाद अब खत्म होने वाली है। 6 फरवरी आखिरी तारीख मानी जा रही है।

क्या है पूरा घोटाला?

वर्ष 2012 में नीरज श्रीवास्तव की भर्ती “अकुशल श्रमिक” के रूप में हुई थी।

आरोप है कि 2014 से ही उन्हें “कुशल श्रमिक” का वेतन और लाभ दिया जाने लगा, जबकि इसकी कोई वैध प्रशासनिक स्वीकृति रिकॉर्ड में नहीं मिली।

इतना ही नहीं, 2014 में उन्हें कंप्यूटर ऑपरेटर के रूप में काम दिलाया गया, जबकि उनका PGDCA डिप्लोमा 2016 में पूरा हुआ बताया जा रहा है।

शिकायतकर्ता का दावा है कि इस पूरी प्रक्रिया में नियमों को दरकिनार कर संरक्षण दिया गया, जिससे 2014 से अब तक निगम को लाखों रुपये की आर्थिक हानि हुई।

लोकायुक्त की सख्ती से, मचा हड़कंप…

लोकायुक्त की कड़ी टिप्पणी के बाद निगम मुख्यालय में हड़कंप की स्थिति बताई जा रही है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर किसके आदेश पर एक कर्मचारी को नियम तोड़कर पदोन्नति और वेतन लाभ दिया गया? और जब मामला लोकायुक्त तक पहुंचा तो निगम ने तथ्यात्मक जवाब देने के बजाय “औपचारिक रिपोर्ट” देकर मामला निपटाने की कोशिश क्यों की?

कमिश्नर और जिम्मेदार, अफसरों पर उठे सवाल…

इस पूरे घटनाक्रम ने नगर निगम कमिश्नर और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही तय कर दी है। आरोप लग रहे हैं कि अंदरखाने संरक्षण के बिना इतनी बड़ी अनियमितता संभव नहीं थी। यदि 6 फरवरी तक संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया तो लोकायुक्त की कार्रवाई सीधे जिम्मेदार अधिकारियों पर गिर सकती है।

अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि निगम सच्चाई सामने रखेगा या फिर एक और लीपापोती वाली रिपोर्ट पेश की जाएगी। अगर दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई तो यह मामला नगर निगम के सबसे बड़े पदोन्नति घोटालों में से एक बन सकता है।

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